Nathdwara

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द्वापर युग में जरासंध और कालयवन ने जिस प्रकार मथुरा पर आक्रमण कर दिया था और उससे बचकर भगवान् श्रीकृष्ण कुछ समय के लिये अन्यत्र चले गये थे एवं शांति होने पर पुनः व्रज लौट आये वैसा का वैसा लीला चरित्र नाथद्वारा में श्रीकृष्ण स्वरूप प्रभु श्रीनाथजी के साथ बना। वि.स. १८३५ में अजमेर मेरवाड़ा के मेरो ने मेवाड पर भयानक आक्रमण किया तथा नृशंस हत्याएं करना प्रारंभ कर दिया। इधर पिंडारियों ने नाथद्वारा में घुसकर लूट खसोट की और धन-जन को हानि पहुँचाई। निरन्तर बढती हुई अशांति के बादल अभी छितरा भी नहीं पाये कि वि.स. १८५८ में दौलतराव सिन्धिया से पराजित होकर जसवन्तराव होल्कर यत्र तत्र भटकता हुआ मेवाड़ भूमि के समीप आ गया। परन्तु सिन्धिया की सेना उसे खोजती हुई नाथद्वारा आ पहुँची। अनवरत युद्धों की विभीषिका के मध्य भी नाथद्वारा का अनुपम वैभव देखकर उन्होने गोस्वामी जी से तीन लाख रूपया मांगा और व्यर्थ का श्रम देकर वसूलने का निरर्थक प्रयास किया। मंदिर की अचल संपति पर भी उसका मन मचल उठा और उसे भी हथियाने की चैष्ठाएँ की जाने लगी।